ऋषिकेश(अंकित तिवारी):यदि कोई व्यक्ति एनीमिया (खून की कमी) से पीड़ित है और उसे बार-बार रक्त चढ़ाने की आवश्यकता पड़ रही है, तो यह समाचार उसके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), ऋषिकेश के चिकित्सकों ने इलाज के दौरान किए गए एक अध्ययन से यह स्पष्ट किया है कि एनीमिया के प्रत्येक रोगी में रक्त चढ़ाना न तो आवश्यक है और न ही हमेशा लाभकारी। कई मामलों में सही समय पर सटीक पहचान और कारण-आधारित इलाज ही रोगी को स्थायी राहत दिला सकता है।
एम्स ऋषिकेश के चिकित्सकों के अनुसार अधिकांश एनीमिया में रक्त आधान आवश्यक हो सकता है, लेकिन ऑटोइम्यून हेमोलिटिक एनीमिया (AIHA) जैसे विशेष मामलों में बार-बार रक्त चढ़ाने के बजाय सही दवाइयों से इलाज करना अधिक सुरक्षित और प्रभावी सिद्ध होता है। यह तथ्य एम्स ऋषिकेश में एक जटिल रोगी के उपचार के दौरान प्रमाणित हुआ है।
क्या है एनीमिया?
एनीमिया एक ऐसी स्थिति है, जिसमें शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं या हीमोग्लोबिन की मात्रा कम हो जाती है। इसके कारण शरीर के विभिन्न अंगों तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती, जिससे व्यक्ति को थकान, कमजोरी, चक्कर आना, सांस फूलना जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। एनीमिया के सामान्य कारणों में आयरन, फोलिक एसिड या विटामिन बी-12 की कमी, अत्यधिक रक्तस्राव तथा कुछ दीर्घकालिक बीमारियां शामिल हैं। चिकित्सकों के अनुसार बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों में इसका खतरा अधिक रहता है।
इलाज के दौरान सामने आया महत्वपूर्ण मामला
पिछले माह एम्स ऋषिकेश की इमरजेंसी में उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद की रहने वाली 55 वर्षीय महिला को अत्यधिक कमजोरी, चक्कर आना, थकान, पेट व कमर के दाहिने हिस्से में तेज दर्द, उल्टियां तथा आंखों और पेशाब का रंग पीला पड़ने की शिकायत के साथ भर्ती कराया गया। रोगी ने बताया कि इसी तरह की समस्या उसे लगभग छह महीने पहले भी हुई थी, जिसके दौरान उसे कई यूनिट रक्त चढ़ाया गया, लेकिन स्थायी लाभ नहीं मिला।
जांच में पाया गया कि रोगी का हीमोग्लोबिन स्तर मात्र 4.4 ग्राम प्रति डेसीलीटर रह गया था। रोग की पुरानी और जटिल स्थिति को देखते हुए जनरल मेडिसिन विभाग की टीम ने बिना जल्दबाजी के विस्तृत और गहन जांच के बाद ही इलाज शुरू करने का निर्णय लिया।
जांच में हुआ खुलासा
रक्त जांच में रोगी को मैक्रोसाइटिक हाइपर-प्रोलिफेरेटिव एनीमिया पाया गया। इस स्थिति में शरीर नई लाल रक्त कोशिकाएं तो बना रहा था, लेकिन वे उतनी ही तेजी से नष्ट भी हो रही थीं। रोगी का रेटिकुलोसाइट काउंट 30 प्रतिशत पाया गया तथा एलडीएच (LDH) का स्तर भी बढ़ा हुआ था, जो लाल रक्त कोशिकाओं के लगातार टूटने (हेमोलाइसिस) का स्पष्ट संकेत था।
इन सभी जांच परिणामों के आधार पर चिकित्सकों ने निष्कर्ष निकाला कि रोगी ऑटोइम्यून हेमोलिटिक एनीमिया से पीड़ित है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली स्वयं की लाल रक्त कोशिकाओं को नष्ट करने लगती है।
एम्स ने अपनाया कारण-आधारित इलाज
एम्स ऋषिकेश के चिकित्सकों ने रोगी की विस्तृत इम्यूनो-हेमेटोलॉजिकल जांच करवाई, जिससे वॉर्म ऑटोइम्यून हेमोलिटिक एनीमिया की पुष्टि हुई। इसके साथ ही रोगी में फोलेट की गंभीर कमी भी पाई गई।
सटीक और समय पर पहचान होने के कारण चिकित्सकों ने तत्काल रक्त चढ़ाने के बजाय कारण-आधारित इलाज को प्राथमिकता दी। रोगी को स्टेरॉयड आधारित दवाओं के साथ फोलेट एवं अन्य सहायक दवाएं दी गईं और अनावश्यक रक्त आधान से बचाया गया। इस उपचार का सकारात्मक परिणाम सामने आया और कुछ ही दिनों में रोगी का हीमोग्लोबिन स्तर 4.4 से बढ़कर 8.2 ग्राम प्रति डेसीलीटर हो गया। इसके बाद रोगी की स्थिति में तेजी से सुधार हुआ और वह स्वस्थ होकर घर लौट गई।
विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम रही शामिल
यह अध्ययन-युक्त इलाज जनरल मेडिसिन विभाग के हेड प्रो. रविकांत के मार्गदर्शन में किया गया। इस टीम में जनरल मेडिसिन विभाग के डॉ. पी.के. पण्डा, डॉ. दरब सिंह, डॉ. अक्षिता और डॉ. गगन दलाल शामिल थे। वहीं ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग की हेड प्रो. गीता नेगी, डॉ. आशीष जैन एवं डॉ. दलजीत कौर ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
“एनीमिया मुख्यतः चार प्रकार का होता है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर एनीमिया में रक्त चढ़ाया जाए। सही समय पर की गई सटीक पहचान ही सुरक्षित और प्रभावी इलाज का आधार है। यह मामला कारण-आधारित चिकित्सा के महत्व को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। एनीमिया से ग्रसित रोगी के इलाज में ‘पहले पहचान, फिर इलाज’ का सिद्धांत अपनाना बेहद आवश्यक है।”
— डॉ. पी.के. पण्डा, जनरल मेडिसिन विभाग, एम्स ऋषिकेश
“हीमोलिटिक एनीमिया, विशेषकर ऑटोइम्यून हेमोलिटिक एनीमिया के इलाज में किसी भी रक्त आधान पर विचार करने से पहले रोगी का विस्तृत और गहन इम्यूनो-हेमेटोलॉजिकल मूल्यांकन अत्यंत आवश्यक है। इससे अनावश्यक रक्त आधान से बचाव संभव है।”
— प्रो. गीता नेगी, हेड, ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग, एम्स ऋषिकेश



