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आजाद हिंद फौज के प्रथम शहीद मेजर दुर्गा मल्ल जी की 80 वी पुण्यतिथि

उत्तराखंड//देहरादून//डोईवाला
(अंकित तिवारी)

भारत की स्वतंत्रता संग्राम की गाथा में अनगिनत वीरों के बलिदान की महक है, जिनमें से एक महान नाम है दुर्गा मल्ल जी का। आजाद हिंद फौज के पहले शहीद के रूप में, उनका बलिदान हमें न केवल गर्व से भरता है बल्कि स्वतंत्रता की उस मशाल की याद दिलाता है जो उन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर प्रज्वलित की थी। इस वर्ष उनकी 80वीं पुण्यतिथि है, और यह हमें उनके योगदान को याद करने और उनके आदर्शों को आत्मसात करने का सुअवसर देती है।

दुर्गा मल्ल जी का जन्म 1 जुलाई 1913 को उत्तराखंड के देहरादून जिले के डोईवाला के घिसरपड़ी खते गांव में हुआ था। गोरखा समुदाय से आने वाले दुर्गा मल्ल जी ने अपने बचपन से ही वीरता और राष्ट्रभक्ति के संस्कारों को आत्मसात किया। मात्र 18 वर्ष की आयु में वे गोरखा रायफल्स की 2/1 बटालियन में भर्ती हुए। लेकिन उनकी असली पहचान तब बनी जब उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ विद्रोह करते हुए, दुर्गा मल्ल जी ने न केवल अपनी सैन्य रणनीति का परिचय दिया, बल्कि अन्य साथियों में भी प्रेरणा और जोश का संचार किया। उनका योगदान उस समय और भी महत्वपूर्ण हो गया जब उन्होंने भारतीय सैनिकों को एकजुट कर उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित किया।

1944 में, उन्हें ब्रिटिश सेना ने गिरफ्तार कर लिया और उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। उनकी बहादुरी और अडिग राष्ट्रभक्ति के कारण उन्हें 25 अगस्त 1944 को दिल्ली के लाल किले में फांसी दी गई। दुर्गा मल्ल जी का बलिदान एक अमिट छाप छोड़ गया और स्वतंत्रता संग्राम को नए सिरे से ऊर्जा प्रदान की।

आज उनकी 80वीं पुण्यतिथि पर, हम उनके अद्वितीय साहस और देशभक्ति को नमन करते हैं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व केवल सत्ता में नहीं, बल्कि अपने देश और अपने लोगों के लिए सेवा और बलिदान में निहित है। उनकी कहानी हमें यह प्रेरणा देती है कि देश के लिए अपने कर्तव्यों का निर्वहन निष्ठा और साहस के साथ किया जाए।

आज जब हम स्वतंत्रता की खुली हवा में सांस ले रहे हैं, यह आवश्यक है कि हम उन वीरों की कुर्बानियों को कभी न भूलें जिनके कारण हमें यह आजादी मिली। दुर्गा मल्ल जी का जीवन, उनका त्याग और उनकी वीरता हमें आज भी प्रेरित करती है और हमेशा करती रहेगी।
*(लेखक अंकित तिवारी शहीद दुर्गा मल्ल स्नातकोत्तर महाविद्यालय , डोईवाला के पूर्व विश्वविद्यालय प्रतिनिधि हैं)*

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