ऋषिकेश(अंकित तिवारी): पंडित ललित मोहन शर्मा परिसर के रसायन शास्त्र विभाग एवं आई.क्यू.ए.सी. द्वारा आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला “हरित सौंदर्य कौशल” का उद्घाटन माननीय कुलपति प्रोफेसर एन.के. जोशी ने रूसा ऑडिटोरियम में किया। इस कार्यशाला का उद्देश्य न केवल व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करना था, बल्कि आत्मनिर्भरता, उद्यमिता और हरित नवाचार की भावना को भी जागृत करना था। उद्घाटन सत्र में प्रोफेसर जोशी ने छात्रों को प्रेरित करते हुए कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रमों से वे न केवल अपना स्टार्टअप शुरू कर सकते हैं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
प्रोफेसर जोशी ने एन.ई.पी. 2020 के संदर्भ में बताया कि विश्वविद्यालय ने अपने पाठ्यक्रमों में स्किल डेवलपमेंट कोर्स को अनिवार्य रूप से शामिल किया है, जिससे छात्रों को व्यावसायिक और तकनीकी कौशल का विकास हो सके।
कार्यशाला में रिसोर्स पर्सन के रूप में डॉक्टर हेमा भंडारी, जो वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के मैत्रयी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं, उपस्थित थीं। डॉ. भंडारी ने कार्यशाला के द्वितीय सत्र में साबुन और लोशन बनाने का प्रशिक्षण प्रदान किया, जो प्रतिभागियों के लिए एक उपयोगी और प्रेरणादायक अनुभव साबित हुआ।
इस कार्यशाला में उत्तराखंड राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों सहित लखनऊ विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा के छात्र-छात्राएं ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों माध्यमों से जुड़े।
कार्यशाला के समन्वयक प्रोफेसर एस.पी. सती ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि इस प्रकार के प्रशिक्षण से प्रतिभागी स्वरोजगार की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं, जो प्रदेश की बेरोजगारी की समस्या के समाधान में सहायक हो सकता है।
इस कार्यशाला में कुल 132 प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिनमें छात्र, शोध छात्र, संकाय सदस्य और उद्यमी शामिल थे।
कार्यशाला के समापन पर प्रोफेसर नीता जोशी ने सभी आगंतुकों और प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर परिसर के निदेशक प्रोफेसर एम.एस. रावत, प्रोफेसर कंचन लता सिंह, प्रोफेसर संगीता मिश्रा, प्रोफेसर पुष्पांजलि आर्य, प्रोफेसर अनीता तोमर, डॉ. गौरव वाष्णेय, डॉ. सीमा बेनीवाल, डॉ. विभा कुमार, प्रोफेसर हितेंद्र सिंह, और अन्य सम्मानित उपस्थित थे।
यह कार्यशाला न केवल छात्रों के लिए एक व्यावहारिक अनुभव था, बल्कि यह आत्मनिर्भरता और हरित उद्यमिता के लिए एक प्रेरणा स्रोत भी बनी।




