उत्तरकाशी(प्रवेश चंद रमोला): देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरा पर विराजमान भगवान बालेश्वर महादेव जी क्षेत्र की अटूट आस्था, प्राचीन परंपरा और शिवभक्ति के दिव्य प्रकाशस्तंभ माने जाते हैं। लोकमान्यताओं के अनुसार बालेश्वर देवता सात दिव्य भाइयों में सबसे छोटे, किंतु अत्यंत तेजस्वी और प्रभावशाली स्वरूप थे। उनका संबंध टिहरी गढ़वाल के घनसाली क्षेत्र से माना जाता है, जहाँ वे केमर के राणा तथा बांसर के सयाणा (प्रधान) के रूप में विख्यात थे — जो उनके नेतृत्व, पराक्रम और धर्मरक्षक स्वरूप को दर्शाता है।
कालांतर में उन्होंने उत्तरकाशी जनपद के मणि गाँव के नेगी परिवार में अवतार धारण कर इस क्षेत्र को अपनी कर्मभूमि बनाया। तभी से वे जनमानस के रक्षक, संकटहारी और लोककल्याणकारी देवता के रूप में प्रतिष्ठित हुए। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि बालेश्वर महादेव केवल एक पूजनीय देवस्वरूप ही नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर और आध्यात्मिक शक्ति के आधार हैं।
उनकी दिव्य कृपा से क्षेत्र में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। आज भी भक्तगण सच्चे मन से उनका स्मरण कर जीवन की बाधाओं से मुक्ति और आत्मिक बल का अनुभव करते हैं। बालेश्वर देवता का यह गौरवशाली इतिहास केवल एक लोककथा नहीं, बल्कि विश्वास, समर्पण और सनातन परंपरा की अमिट गाथा है — जो पीढ़ी दर पीढ़ी श्रद्धा के साथ हृदयों में जीवित है।
दिव्य प्राकट्य की अलौकिक गाथा
स्थानीय श्रद्धा और जनश्रुति के अनुसार, हरूली नामक पावन स्थल पर स्वयंभू शिवलिंग के रूप में दिव्य प्राकट्य किया। यह कोई साधारण प्रकट होना नहीं था, बल्कि ईश्वरीय लीला का अद्भुत संकेत था।
समय बीतने पर नेगी परिवार के पूर्वजों की एक गाय प्रतिदिन हरूली में चरने जाया करती थी। किंतु आश्चर्य यह था कि दिनभर चरने के बाद वह एक स्वयंभू शिवलिंग के समीप जाकर अपने आप ही दूध की पवित्र धारा अर्पित कर देती थी। परिणामस्वरूप उसके स्वामी को घर पर दूध नहीं मिल पाता था।
लगातार कई दिनों तक ऐसा होने पर स्वामी के मन में संदेह उत्पन्न हुआ। सत्य जानने के लिए एक दिन वे चुपचाप गाय के पीछे-पीछे हरूली पहुँचे और वृक्षों की ओट में छिपकर प्रतीक्षा करने लगे।
सायंकाल का वह पवित्र क्षण आया, जब गाय ने अत्यंत श्रद्धा से शिवलिंग पर दूध अर्पित करना प्रारंभ किया। यह अलौकिक दृश्य देखकर वे क्रोधित हुए, और आवेश में आकर उन्होंने उस स्वयंभू शिवलिंग पर प्रहार कर दिया।
कहा जाता है कि शिवलिंग तीन खंडों में विभक्त हो गया—
एक खंड नेगी परिवार के घर आ गिरा,दूसरा वर्तमान मंदिर स्थल पर स्थापित हुआ जो बालेश्वर महादेव के नाम से जाना गया,और तीसरा खंड उसी हरूली की पावन भूमि पर स्थित रह गया।
इस दिव्य घटना के पश्चात वहाँ अद्भुत चमत्कार प्रकट होने लगे। लोगों ने अनुभव किया कि यह स्थान साधारण नहीं, बल्कि स्वयं महादेव की कृपा से आलोकित सिद्ध पीठ है। तभी से भगवान बालेश्वर महादेव की महिमा दूर-दूर तक फैल गई और यह स्थल श्रद्धालुओं के लिए आस्था, चमत्कार और दिव्य अनुभूति का केंद्र बन गया।
यह कथा केवल प्राकट्य की नहीं, बल्कि ईश्वर की अनंत लीला और भक्तों पर बरसती उनकी असीम कृपा की अमर गाथा है।
महाशिवरात्रि की दिव्य रात्रि आस्था, परंपरा और अलौकिक साधना
सर्वप्रथम इस पावन अवसर पर चारों गाँवों के श्रद्धालु अपार श्रद्धा और उल्लास के साथ एकत्रित होते हैं। देवता की पवित्र निशानियाँ, पारंपरिक वाद्य यंत्र और चाँदी से सुसज्जित ढोल-नगाड़ों को बड़े आदरपूर्वक अलंकृत किया जाता है। जब भव्य शोभायात्रा आरंभ होती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं देवमंडल धरती पर अवतरित हो गया हो। “हर-हर महादेव” और “जय श्री बालेश्वर महादेव” के गगनभेदी जयघोष से सम्पूर्ण क्षेत्र दिव्य ऊर्जा से स्पंदित हो उठता है। प्रत्येक हृदय में आस्था की ज्योति प्रज्वलित हो जाती है और वातावरण शिवमय हो जाता है।
महाशिवरात्रि का पावन पर्व यहाँ अद्भुत आस्था, तपस्या और भक्ति का दिव्य संगम बन जाता है। इस परम पवित्र अवसर पर मंदिर प्रांगण भक्तों की अखंड श्रद्धा से आलोकित हो उठता है। क्षेत्रवासियों के साथ-साथ दूर-दूर से आए श्रद्धालु व्रत धारण कर, हाथों में दीपक लेकर एक ही स्थान पर शांत भाव से विराजमान होते हैं और संपूर्ण रात्रि भगवान बालेश्वर महादेव के श्रीचरणों में ध्यानमग्न होकर , जय बालेश्वर महादेव और “ॐ नमः शिवाय” जप, स्तुति और स्मरण करते हैं।
मान्यता है कि इस दिव्य रात्रि में की गई निष्काम साधना और अटूट भक्ति से बालेश्वर महादेव अति प्रसन्न होकर अपने भक्तों के समस्त कष्ट हर लेते हैं। भूत-प्रेत बाधाएँ, नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव और जीवन के गहन दुःख शिवकृपा से नष्ट हो जाते हैं। जो भी भक्त सच्चे मन, निर्मल हृदय और अटूट विश्वास के साथ प्रार्थना करता है, उसकी मनोकामनाएँ अवश्य पूर्ण होती हैं।
यह केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण का क्षण है; यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि बालेश्वर महादेव से जुड़ने का दिव्य अवसर है। यहाँ भक्ति ही साधन है, श्रद्धा ही शक्ति है और शिव ही परम सत्य हैं।
दिव्य पीपल वृक्ष की अद्भुत कथा
गोरखाओं के युद्धकाल का वह भयावह समय था, जब गोरखा सैनिक मंदिरों में लूटपाट करते हुए आगे बढ़ रहे थे। कहा जाता है कि जब वे इस पावन मंदिर की ओर आए, तब मंदिर के समीप स्थित एक छोटे से पीपल के वृक्ष के नीचे भगवान बालेश्वर महादेव के चाँदी के ढोल-दमाऊ, भंकोर और अन्य पवित्र वाद्य यंत्र सुरक्षित रखे हुए थे।
जैसे ही संकट निकट आया, उस छोटे से पीपल ने चमत्कारिक रूप से विशाल स्वरूप धारण कर लिया और उन दिव्य वाद्य यंत्रों को अपने भीतर समाहित कर लिया—मानो स्वयं प्रकृति ने भगवान की धरोहर की रक्षा का संकल्प लिया हो।
स्थानीय जनश्रुति के अनुसार, पूर्वज बताते थे कि कई वर्षों तक उस वृक्ष के भीतर से कभी-कभी ढोल-दमाऊ की मधुर ध्वनि सुनाई देती थी, जैसे देव आराधना आज भी अनवरत चल रही हो।
और आश्चर्य की बात यह भी है कि आज भी उस पीपल के तने पर पंचनाग के समान आकृतियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं, जो भगवान बालेश्वर महादेव के दिव्य नागों का आभास कराती हैं।
वृक्ष का असाधारण विशाल रूप और उस पर उकेरी गई दिव्य आकृतियाँ, स्थानीय लोगों द्वारा कही गई इन चमत्कारी घटनाओं को मानो सत्य सिद्ध करती प्रतीत होती हैं।
यह कथा केवल एक वृक्ष की नहीं, बल्कि आस्था, संरक्षण और दिव्य चमत्कार की अमर गाथा है।






