मसूरी/देहरादून(अंकित तिवारी): बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, केन्द्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ के स्नातक चतुर्थ सेमेस्टर भूविज्ञान विभाग के छात्रों ने आज प्रसिद्ध केम्प्टी जलप्रपात, मसूरी का शैक्षणिक भ्रमण कर क्षेत्र की भौगोलिक, पारिस्थितिक और भूवैज्ञानिक विशेषताओं का गहन अध्ययन किया। यह अध्ययन भ्रमण छात्रों के लिए एक ‘ओपन जियोलॉजी लैब’ जैसा अनुभव साबित हुआ।
इस दौरान डॉ. सौरभ बर्मन एवं उत्तराखंड लोक निर्माण विभाग में कार्यरत वरिष्ठ भूवैज्ञानिक शिव राय ने छात्रों को केम्प्टी फॉल्स की संरचना, उत्पत्ति और भूवैज्ञानिक महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मसूरी से लगभग 15 किलोमीटर दूर चकराता मार्ग पर स्थित यह जलप्रपात समुद्र तल से 1364 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण क्षेत्र का प्रमुख आकर्षण है। लगभग 4500 फीट की ऊंचाई से निकलने वाली बारहमासी जलधाराएं 40 फीट ऊंचे झरने के रूप में गिरकर नीचे एक सुंदर तालाब का निर्माण करती हैं।
विशेषज्ञों ने छात्रों को बताया कि मसूरी की पहाड़ियां अपनी ऊबड़-खाबड़ स्थलाकृति, गहरी घाटियों और 600 से 2300 मीटर तक फैली ऊंचाई के लिए जानी जाती हैं। इस क्षेत्र में क्रोल बेल्ट की प्रोटेरोज़ोइक-कैम्ब्रियन चट्टानें मुख्य सीमा थ्रस्ट के माध्यम से सिवालिक समूह की नियोजीन तलछटी चट्टानों पर आरोपित हैं, जो इसे भूवैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती हैं।
डॉ. बर्मन ने यह भी बताया कि केम्प्टी फॉल क्षेत्र न केवल भूविज्ञान बल्कि वनस्पति विज्ञान के अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण है। यहाँ के जंगलों में ओक, पाइन, शीशम एवं मिश्रित वनस्पति समुदाय प्रमुख रूप से पाए जाते हैं। क्वेरकस ल्यूकोट्रिचोफोरा (ओक), पिनस रोक्सबर्गी (पाइन) और डालबर्गिया सिस्सू (शीशम) जैसी प्रजातियाँ यहाँ के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
भूविज्ञान, मिट्टी और वनस्पति के बीच संबंधों को स्पष्ट करते हुए विशेषज्ञों ने बताया कि चूना पत्थर, क्वार्टजाइट, डोलोमाइट और स्लेट जैसी चट्टानें विभिन्न ऊंचाइयों पर अलग-अलग वनस्पति समुदायों का आधार बनती हैं। पोषक तत्वों से भरपूर झरझरी चट्टानें पौधों की वृद्धि को बढ़ावा देती हैं, जबकि उच्च कटाव दर और कार्बोनेट की घुलनशीलता झरनों के निर्माण में सहायक होती है।
भ्रमण के दौरान छात्रों ने क्षेत्र की जैव विविधता का भी अवलोकन किया। यहाँ सफेद कलगीदार कलीज तीतर, नीला रॉक कबूतर, व्हिसलिंग थ्रश, वाटर रेडस्टार्ट और लाल चोंच वाला नीला मैगपाई जैसे पक्षियों के साथ तेंदुए की उपस्थिति भी क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता को दर्शाती है।
हालांकि, विशेषज्ञों ने क्षेत्र में बढ़ते भूस्खलन और अचानक बाढ़ के खतरे पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि 60 डिग्री से अधिक ढलान और अत्यधिक खंडित क्रोल चूना पत्थर के कारण यह क्षेत्र भूस्खलन के लिए अत्यंत संवेदनशील है। जलवायु परिवर्तन के चलते अनियमित वर्षा और बढ़ता अपक्षय इस खतरे को और अधिक बढ़ा रहे हैं।
इस शैक्षणिक भ्रमण के अंत में छात्रों ने मसूरी पहाड़ियों की विशेषताओं का प्रत्यक्ष अध्ययन करते हुए अपने ज्ञान को और समृद्ध किया। इस सफल आयोजन के लिए छात्रों ने विभागाध्यक्ष प्रो. नरेंद्र कुमार एवं भूविज्ञान विभाग के समस्त प्राध्यापकों का आभार व्यक्त किया।
यह अध्ययन भ्रमण छात्रों के लिए न केवल ज्ञानवर्धक रहा, बल्कि प्रकृति और विज्ञान के अद्भुत संगम का जीवंत अनुभव भी बना।




