ऊधमसिंह नगर(अंकित तिवारी): उत्तराखण्ड-संस्कृत-संस्थानम्, हरिद्वार की ओर से संस्कृत मास महोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित राज्यस्तरीय अन्तर्जालीय संस्कृत संगोष्ठी की जनपदवार श्रृंखला के अंतर्गत रविवार को ऊधमसिंह नगर जनपद द्वारा ‘भारतीय-भाषाणां संवर्धनाय संस्कृतस्य योगदानम्’ विषय पर ई-संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का उद्देश्य जन-जन तक संस्कृत भाषा का प्रचार-प्रसार करना तथा भारतीय भाषाओं के संवर्धन में संस्कृत के महत्त्व को रेखांकित करना रहा।

संगोष्ठी में उत्तराखण्ड-संस्कृत-संस्थानम्, हरिद्वार के सचिव प्रो. विनय कुमार विद्यालंकार ने विषय पर विस्तृत व्याख्यान देते हुए भारतीय भाषाओं के विकास में संस्कृत की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए संस्थान की ओर से किए जा रहे विभिन्न कार्यों की भी जानकारी दी।

कार्यक्रमाध्यक्ष एवं राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार डॉ. कीर्तिवल्लभ शक्टा ने कहा कि संस्कृत भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा की महत्वपूर्ण भाषा है। भारतीय भाषाओं के विकास और उनके पारस्परिक संबंधों को समझने में संस्कृत का अध्ययन अत्यंत उपयोगी है।
मुख्यातिथि उत्तरप्रदेश-संस्कृत-संस्थानम् के भूतपूर्व अध्यक्ष आचार्य वाचस्पति मिश्र ने अपने संबोधन में “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” का उल्लेख करते हुए संस्कृत की गौरवशाली परंपरा और भारतीय संस्कृति में उसके योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने संस्कृत की परंपरा, अखंडता और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।

मुख्यवक्ता प्रत्नकीर्ति प्राच्य शोध संस्थानम्, वाराणसी के सचिव आचार्य प्रताप कुमार मिश्र ने कहा कि भारत में गढ़वाली, कुमाऊनी, भोजपुरी, बंगला, नेपाली सहित अनेक भाषाओं का प्रयोग होता है। इन भाषाओं के व्याकरणिक एवं भाषिक स्वरूप का अध्ययन करने पर संस्कृत के साथ उनके गहरे संबंध दिखाई देते हैं। उन्होंने भारतीय भाषाओं के अध्ययन में संस्कृत के ज्ञान को उपयोगी बताया।

सहवक्ता एवं असिस्टेंट प्रोफेसर व्याकरण डॉ. श्रीओम शर्मा ने महाभाष्यकार महर्षि पतञ्जलि के संदर्भ का उल्लेख करते हुए संस्कृत के अध्ययन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं की संरचना एवं शब्द-परंपरा को समझने के लिए संस्कृत का ज्ञान महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।

विशिष्ट अतिथि हंसराज महाविद्यालय, नई दिल्ली की सहायकाचार्या डॉ. खुशबू शुक्ला ने “संस्कृतं नाम दैवी वाक् अन्वाख्याता महर्षिभिः” का उल्लेख करते हुए संस्कृत को भारतीय ज्ञान एवं वाङ्मय की महत्वपूर्ण भाषा बताया। उन्होंने संस्कृत के अध्ययन और संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया।
संगोष्ठी का सफल संचालन राजकीय महाविद्यालय तल्ला सल्ट, अल्मोड़ा के संस्कृत विभागाध्यक्ष एवं जनपद संयोजक डॉ. राघव कुमार झा ने किया। कार्यक्रम की संपूर्ण तकनीकी व्यवस्था राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कर्णप्रयाग, चमोली के संस्कृत विभाग के सहायकाचार्य एवं जनपद सहसंयोजक डॉ. अंकित मनोड़ी द्वारा संपादित की गई। उन्होंने अंत में सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।

अन्तर्जालीय माध्यम से आयोजित इस ई-संगोष्ठी में उत्तराखण्ड के साथ-साथ राजस्थान, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, पंजाब, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों के प्रतिभागियों ने सहभागिता की। संगोष्ठी में भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और उनके भाषिक आधार को समझने में संस्कृत की भूमिका पर सार्थक विमर्श हुआ।




