पौड़ी(अंकित तिवारी): हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के बी.जी.आर. परिसर, पौड़ी स्थित संस्कृत विभाग द्वारा आयोजित व्याख्यान श्रृंखला का चतुर्थ एवं अंतिम व्याख्यान शुक्रवार को सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारम्भ वैदिक मंगलाचरण के साथ हुआ, जिससे पूरे वातावरण में आध्यात्मिक एवं विद्वतापूर्ण ऊर्जा का संचार हुआ।
व्याख्यान श्रृंखला के इस अंतिम सत्र में विद्वानों ने दर्शन, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के परस्पर संबंधों पर गंभीर विचार-विमर्श किया। कार्यक्रम का संचालन अंग्रेजी विभाग के डॉ. धर्मेन्द्र कुमार द्वारा कुशलतापूर्वक किया गया, जबकि कार्यक्रम संयोजक डॉ. दिनेश चंद्र पाण्डेय ने मुख्य अतिथि एवं वक्ता का परिचय उपस्थित प्रतिभागियों से कराया।
इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. कंचन तिवारी ने “दर्शन, विज्ञान और प्रौद्योगिकी” विषय पर विस्तृत व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि मानव सभ्यता के विकास में दर्शन, विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। इन तीनों के बीच गहरा अंतर्संबंध है, जो मानव जीवन के ज्ञान, चिंतन और प्रगति की दिशा निर्धारित करता है।

उन्होंने विशेष रूप से दर्शन की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि दर्शन केवल एक विषय नहीं, बल्कि सभी ज्ञान-विषयों का आधार है। दर्शन ही वह माध्यम है जो विचारों को दिशा देता है और ज्ञान के विविध क्षेत्रों के बीच सेतु का कार्य करता है।
डॉ. तिवारी ने भारतीय दर्शन के विभिन्न आयामों—जैसे तत्त्वमीमांसा, ज्ञानमीमांसा और नैतिक चिंतन—पर प्रकाश डालते हुए बताया कि भारतीय चिंतन परंपरा में विज्ञान और दर्शन का संबंध अत्यंत प्राचीन और गहरा रहा है। उन्होंने श्रोताओं को भारतीय दार्शनिक परंपराओं की बारीकियों से अवगत कराते हुए यह भी बताया कि आधुनिक विज्ञान और तकनीकी विकास के युग में भी दर्शन की प्रासंगिकता बनी हुई है। इसके अतिरिक्त उन्होंने शब्द-विज्ञान के संदर्भ में भी अपने विचार साझा करते हुए भाषा और ज्ञान के संबंधों को स्पष्ट किया।
कार्यक्रम की समन्वयिका प्रो. कुसुम डोबरियाल ने मुख्य वक्ता का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि डॉ. कंचन तिवारी का व्याख्यान अत्यंत प्रासंगिक, ज्ञानवर्धक और सारगर्भित रहा, जिसने विद्यार्थियों और शोधार्थियों को नए दृष्टिकोण प्रदान किए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे परिसर निदेशक प्रो. यू.सी. गैरोला ने अपने संबोधन में कहा कि दर्शन और विज्ञान के बीच संवाद आज के समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जब दार्शनिक चिंतन और वैज्ञानिक दृष्टि का समन्वय होता है, तभी समाज और मानवता के लिए सार्थक प्रगति संभव हो पाती है।
कार्यक्रम के अंत में अर्थशास्त्र विभाग के डॉ. विपुल सिंह ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शिक्षकगणों और विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए व्याख्यान श्रृंखला के सफल आयोजन के लिए संस्कृत विभाग को बधाई दी।
इस अवसर पर परिसर निदेशक प्रो. यू.सी. गैरोला, कार्यक्रम समन्वयिका प्रो. कुसुम डोबरियाल सहित विभिन्न विभागों के शिक्षकगण, शोधार्थी तथा बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। उपस्थित श्रोताओं ने व्याख्यान के विषय को समसामयिक, ज्ञानवर्धक एवं अत्यंत प्रासंगिक बताते हुए इसकी सराहना की।




