देहरादून(अंकित तिवारी)। श्री सनातन धर्म मंदिर, नेहरू कॉलोनी, देहरादून में श्रावण मास के पावन अवसर पर आयोजित श्री शिवमहापुराण कथा का चतुर्थ दिवस श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक भावनाओं के साथ संपन्न हुआ। कथा व्यासपीठासीन पूज्य श्री पवन देव चतुर्वेदी जी महाराज (श्रीधाम वृन्दावन) ने भगवान शिव, माता सती एवं राजा दक्ष के प्रसंग का अत्यंत मार्मिक एवं भावपूर्ण वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को धर्म, विनम्रता और क्षमा का संदेश दिया।
कथा के दौरान महाराज श्री ने कहा कि अहंकार मनुष्य के पतन का सबसे बड़ा कारण है। उन्होंने बताया कि राजा दक्ष ने अपने अहंकारवश भगवान शिव का अपमान किया और यज्ञ में उन्हें आमंत्रित नहीं किया। जब माता सती अपने पिता के यज्ञ में पहुँचीं और वहाँ भगवान शिव का निरादर देखा, तो पति एवं धर्म के सम्मान की रक्षा के लिए उन्होंने योगाग्नि में अपने शरीर का त्याग कर दिया।
इस करुण प्रसंग का वर्णन सुनकर कथा पंडाल में उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे और अनेक श्रद्धालुओं की आँखें नम हो गईं। महाराज श्री ने आगे बताया कि माता सती के देहत्याग का समाचार प्राप्त होने पर भगवान शिव ने अपनी जटा से वीरभद्र और भद्रकाली को प्रकट किया, जिन्होंने राजा दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर अधर्म का अंत किया। वीरभद्र ने राजा दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया, किंतु अंततः भगवान शिव ने अपनी असीम करुणा का परिचय देते हुए दक्ष को बकरे का सिर लगाकर पुनर्जीवन प्रदान किया। इस प्रसंग से क्षमा, करुणा और धर्म की सर्वोच्च महत्ता का संदेश मिलता है।
कथा के दौरान महाराज श्री ने इक्यावन शक्तिपीठों की उत्पत्ति का भी विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने बताया कि सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अंगों का विभाजन किया। जहाँ-जहाँ माता के अंग, आभूषण और वस्त्र गिरे, वहीं दिव्य शक्तिपीठ स्थापित हुए, जो आज भी श्रद्धा, भक्ति और शक्ति के महान केंद्र हैं।
कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने भगवान शिव एवं आदिशक्ति जगदम्बा के जयघोष के साथ धर्म, भक्ति और सदाचार के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। इसके उपरांत सामूहिक आरती संपन्न हुई तथा श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया।




