धर्म-कर्म

संस्कारवान शिक्षा से ही राष्ट्र का उज्ज्वल भविष्य संभव : डॉ. दुर्गेश आचार्य

श्रीमद्भागवत कथा में ध्रुव-प्रह्लाद के आदर्शों से धर्म, संस्कार और सद्कर्म का संदेश

देहरादून(अंकित तिवारी)। बद्रीपुर-जोगीवाला स्थित नाइन पाम्स रिसोर्ट में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिवस पर राष्ट्रीय संत एवं भागवत कथा मर्मज्ञ डॉ. दुर्गेश आचार्य ने श्रद्धालुओं को धर्म, संस्कार और सद्कर्मों का महत्व बताते हुए कहा कि बच्चों को बाल्यकाल से ही संस्कारयुक्त शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए। संस्कार ही व्यक्ति की वास्तविक पहचान होते हैं और इन्हीं के बल पर उसकी कीर्ति चारों दिशाओं में फैलती है।

उन्होंने कहा कि साधारण अथवा आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में जन्म लेने वाली संतान भी यदि संस्कारवान शिक्षा प्राप्त करे तो वह आगे चलकर अपने कुल, समाज और राष्ट्र का नाम गौरवान्वित कर सकती है। भारतीय इतिहास ऐसे अनेक प्रेरक उदाहरणों से भरा पड़ा है।

डॉ. आचार्य ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा समाज में व्याप्त घृणा, द्वेष और वैमनस्य को समाप्त कर प्रेम, सद्भाव और मानवता का संदेश देती है। सनातन धर्म विश्व का सर्वश्रेष्ठ धर्म है और उसका मूल उद्देश्य समस्त प्राणियों के कल्याण की भावना को विकसित करना है। उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य धर्म की रक्षा करता है तो धर्म भी उसकी रक्षा करता है।

कथाव्यास ने माता-पिता की सेवा को ईश्वर प्राप्ति का सर्वोत्तम मार्ग बताते हुए कहा कि माता-पिता ही घर रूपी मंदिर के साक्षात देवता हैं। उन्होंने कहा कि जीवन रूपी भवसागर से पार लगाने में गुरु ही नौका का कार्य करते हैं। संपत्ति का उपभोग करने वाला केवल उत्तराधिकारी हो सकता है, किंतु कुल और समाज का नाम रोशन करने का कार्य संस्कारवान संतान ही करती है।

कथा के दौरान डॉ. दुर्गेश आचार्य ने भक्त ध्रुव और भक्त प्रह्लाद की प्रेरणादायी जीवन कथाओं का वर्णन करते हुए धर्म और अधर्म के अनेक प्रसंगों के माध्यम से श्रद्धालुओं को सद्कर्मों के मार्ग पर चलने का आह्वान किया।

कथा के समापन सत्र में भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की मनोहारी झांकी प्रस्तुत की गई, जिसे देखकर उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। भक्ति और श्रद्धा से ओतप्रोत वातावरण में श्रद्धालुओं ने भगवान के जयघोष के साथ झांकी का दर्शन किया।

गौरतलब है कि  ऊषा नौटियाल द्वारा अपने स्वर्गीय पति भगवती प्रसाद नौटियाल की पुण्य स्मृति एवं वार्षिक श्राद्ध के अवसर पर इस दिव्य श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन कराया जा रहा है। देहरादून सहित उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रतिदिन कथा श्रवण के लिए पहुंच रहे हैं। कथा का समापन 19 जून को होगा।

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