ऋषिकेश(अंकित तिवारी)। श्रीदेव सुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय में जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और आपदा रोधी पर्यटन के भविष्य को लेकर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का समापन हुआ। विश्वविद्यालय के आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (आईक्यूएसी), जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण टिहरी गढ़वाल, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, भारत सरकार एवं यूकॉस्ट के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सम्मेलन का विषय ‘जलवायु परिवर्तन और आपदा रोधी पर्यटन के लिए डिजिटल एजेंडा एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ (CEDRT-2026) रहा। सम्मेलन में देश-विदेश के 350 से अधिक प्रतिभागियों ने सहभागिता की, जबकि तकनीकी सत्रों में लगभग 80 शोधार्थियों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए।
समापन समारोह के मुख्य अतिथि प्रदेश के कैबिनेट मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने उत्तराखंड में पर्यटन विकास की व्यापक संभावनाओं, धार्मिक एवं प्राकृतिक पर्यटन के महत्व तथा आपदा प्रबंधन से जुड़ी चुनौतियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रदेश में सुरक्षित, सतत एवं जिम्मेदार पर्यटन को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है। इसके लिए आपदाओं से निपटने की प्रभावी तैयारी, पर्यावरण संरक्षण और आधुनिक तकनीकों का उपयोग जरूरी है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि सम्मेलन में विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत शोध निष्कर्ष एवं सुझाव प्रदेश सरकार के लिए उपयोगी साबित होंगे तथा सतत पर्यटन विकास एवं प्रभावी आपदा प्रबंधन की नीतियों को नई दिशा प्रदान करेंगे।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अंबरीश कुमार महाजन ने कहा कि सम्मेलन में देश-विदेश के विशेषज्ञों एवं शोधकर्ताओं ने जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण, पर्यटन के सतत विकास और आपदा प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर सार्थक विचार-विमर्श किया। प्रस्तुत शोधपत्र एवं सुझाव भविष्य में नीतियों और योजनाओं के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।
परिसर निदेशक प्रो. एम.एस. रावत ने सम्मेलन के सफल आयोजन में सहयोग देने वाले अतिथियों, वक्ताओं, शोधकर्ताओं, प्रतिभागियों एवं आयोजन समिति के सदस्यों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सभी की सहभागिता से सम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ और इससे प्राप्त विचार सतत पर्यटन विकास के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होंगे। वहीं, आईक्यूएसी निदेशक प्रो. गुलशन कुमार ढींगरा ने सम्मेलन के उद्देश्यों एवं प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसका मुख्य उद्देश्य सतत पर्यटन, पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन से जुड़े विषयों पर शैक्षणिक विमर्श एवं शोध को प्रोत्साहित करना रहा। उन्होंने मुख्य अतिथि डॉ. धन सिंह रावत का विशेष आभार व्यक्त किया।
ग्लेशियरों के पिघलने से लेकर हिमालयी जैव विविधता तक पर हुआ मंथन
सम्मेलन के तकनीकी सत्रों में विशेषज्ञों ने जलवायु परिवर्तन के हिमालयी पर्यावरण, वनस्पतियों, पर्यटन एवं सांस्कृतिक विरासत पर पड़ रहे प्रभावों को विभिन्न शोधों के माध्यम से रेखांकित किया।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी, रुड़की के प्रो. एल.एन. ठुकराल ने जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारणों में तापमान में निरंतर वृद्धि और स्नो कवर में कमी को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने ग्लेशियल झीलों के विस्तार, ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की निगरानी तथा मैपिंग के लिए आधुनिक टूल्स की विस्तृत जानकारी दी। डॉ. दीपिका यजुर्वेदी ने ग्रीन केमिस्ट्री टूरिज्म विषय पर अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया।
भूतपूर्व उच्च शिक्षा निदेशक प्रो. एन.पी. माहेश्वरी ने ‘उत्तराखंड में अनुभवात्मक पर्यटन : देवभूमि पर्यटन में बदलाव लाने में संवर्धित एवं आभासी वास्तविकता तकनीक (AR/VR) की भूमिका’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक के माध्यम से प्रदेश के धार्मिक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक पर्यटन स्थलों को वैश्विक स्तर पर नए और आकर्षक स्वरूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। इससे पर्यटन के अनुभव को अधिक प्रभावी बनाने के साथ नए अवसर भी विकसित होंगे।
भरसार स्थित उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. एस.पी. सती ने जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी वनस्पतियों एवं विभिन्न फसलों के जीवन चक्र में हो रहे बदलावों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बुरांश का उदाहरण देते हुए बताया कि जलवायु में बदलाव का प्रभाव स्थानीय वनस्पतियों की प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर भी पड़ रहा है।
पंडित ललित मोहन शर्मा परिसर के वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. वी.डी. पांडे ने ‘सांस्कृतिक विरासत संरचनाओं पर सायनोबैक्टीरिया का प्रभाव’ विषय पर व्याख्यान देते हुए ऐतिहासिक स्मारकों एवं विरासत स्थलों पर इनके दुष्प्रभावों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सायनोबैक्टीरिया के कारण ऐतिहासिक संरचनाओं को नुकसान पहुंच सकता है। ऐसी धरोहरों के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक उपायों और प्रभावी संरक्षण रणनीतियों की आवश्यकता है।
प्रो. डी.सी. गोस्वामी ने गढ़वाल हिमालय में सतत एवं जिम्मेदार धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने पर जोर दिया। उन्होंने चारधाम यात्रा के संदर्भ में हिमालयी पर्यावरण संरक्षण, कचरा प्रबंधन, तीर्थयात्रियों की संख्या के नियमन तथा स्थानीय समुदायों की भागीदारी को आवश्यक बताया। उन्होंने धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए पर्यावरण अनुकूल पर्यटन विकसित करने का संदेश दिया।
वहीं, प्रो. वी.पी. श्रीवास्तव ने ‘बियॉन्ड ट्रेडिशनल टूरिज्म’ विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए पारंपरिक पर्यटन से आगे बढ़कर नए पर्यटन अवसरों, नवाचार, सतत विकास तथा स्थानीय संस्कृति एवं विरासत के संरक्षण की संभावनाओं पर चर्चा की।
350 से अधिक प्रतिभागियों की रही सहभागिता
सम्मेलन के दौरान विभिन्न तकनीकी सत्रों में शोधार्थियों एवं विशेषज्ञों ने अपने शोधपत्रों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक, पर्यटन प्रबंधन और आपदा जोखिम न्यूनीकरण के विविध पहलुओं को सामने रखा। लगभग 80 शोधार्थियों द्वारा शोधपत्र प्रस्तुत किए जाने के साथ सम्मेलन ने शैक्षणिक एवं शोध विमर्श के लिए महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया।
कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. प्रीति खंडूरी एवं डॉ. हेमंत बिष्ट ने किया। आयोजन मंडल में डॉ. सीमा बेनीवाल, डॉ. गौरव वाष्णेय, डॉ. राकेश जोशी एवं डॉ. संजय महर का विशेष सहयोग रहा।
इस अवसर पर डीन विज्ञान प्रो. एस.पी. सती, डीन कला प्रो. पी.के. सिंह, डीन वाणिज्य प्रो. विजय श्रीवास्तव, चीफ प्रॉक्टर प्रो. धर्मेंद्र तिवारी, डीन छात्र कल्याण प्रो. हेमलता मिश्रा, प्रो. वी.डी. पांडे, प्रो. संगीता मिश्रा, प्रो. अधीर कुमार, प्रो. पुष्पांजलि आर्य, प्रो. दीपा शर्मा, प्रो. सुरमान, प्रो. वी.के. गुप्ता, प्रो. सी.एस. नेगी, डॉ. शालिनी रावत सहित विश्वविद्यालय के प्राध्यापक एवं शिक्षणेत्तर कर्मचारी उपस्थित रहे।










