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नशे के खिलाफ ‘पहली रक्षा पंक्ति’ बनेंगे शिक्षण संस्थान

(विश्वविद्यालयों को भेजा रोडमैप, 500 मीटर के दायरे में नशीले पदार्थों की बिक्री पर कड़ी निगरानी के निर्देश)

देहरादून(अंकित तिवारी)। उत्तराखंड में युवाओं को नशे की गिरफ्त से बचाने के लिए शिक्षण संस्थानों की भूमिका और मजबूत की जाएगी। स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय नशामुक्ति अभियान में ‘पहली रक्षा पंक्ति’ के रूप में काम करेंगे। इसके लिए उत्तराखंड राज्य उच्च शिक्षा उन्नयन समिति के उपाध्यक्ष प्रो. देवेंद्र भसीन ने प्रदेश के राजकीय एवं अन्य विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को पत्र भेजकर केंद्र सरकार के नशामुक्ति रोडमैप के अनुरूप प्रभावी कदम उठाने का आग्रह किया है।

प्रो. भसीन ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिशा-निर्देशन और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तथा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में देश और उत्तराखंड में नशे के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाया जा रहा है। वर्ष 2029 तक देश को नशामुक्त बनाने के लक्ष्य में शिक्षण संस्थानों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इसी कारण विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को नशे के खिलाफ जागरूकता और रोकथाम का मजबूत केंद्र बनाने पर जोर दिया गया है।

शिक्षण संस्थानों के आसपास रहेगी सख्त निगरानी

रोडमैप के तहत स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को ‘नशामुक्त परिसर’ बनाने तथा बफर जोन तैयार करने को कहा गया है। शिक्षण संस्थानों के आसपास 500 मीटर के दायरे में नशीले पदार्थों, तंबाकू और सिगरेट आदि की बिक्री पर सख्त निगरानी रखने और रोक लगाने के लिए आवश्यक कदम उठाने पर जोर दिया गया है।

इसके साथ ही एनसीसी, एनएसएस और ‘माई भारत’ के स्वयंसेवकों के माध्यम से बड़े स्तर पर ‘नशामुक्ति मित्र’ तैयार करने की योजना है। ये स्वयंसेवक विद्यार्थियों और युवाओं के बीच नशे के दुष्प्रभावों को लेकर जागरूकता फैलाने के साथ उनसे नियमित संवाद भी करेंगे।

*पाठ्यक्रम से लेकर कार्यशालाओं तक चलेगा अभियान

नशे के खिलाफ जागरूकता को केवल अभियान तक सीमित न रखते हुए इसे शैक्षणिक गतिविधियों से जोड़ने पर भी जोर दिया गया है। शिक्षण पाठ्यक्रम में नशे के दुष्प्रभावों पर केंद्रित शिक्षा के साथ कार्यशालाएं, वाद-विवाद और पोस्टर प्रतियोगिताएं आयोजित करने का सुझाव दिया गया है।

शिक्षकों और प्रशासकों को विशेष प्रशिक्षण देने की भी बात कही गई है, ताकि वे विद्यार्थियों के व्यवहार में अचानक आने वाले बदलावों और नशे के शुरुआती संकेतों की पहचान कर सकें। जरूरत पड़ने पर विद्यार्थियों को सामाजिक कलंक से बचाते हुए सही परामर्श और सहायता उपलब्ध कराई जा सके, इसके लिए पेशेवर मानसिक स्वास्थ्य परामर्शदाताओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर भी जोर है।

कॉलेजों में बनेंगी ‘एंटी-ड्रग कमेटियां’

कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में ‘एंटी-ड्रग कमेटियों’ के गठन का भी सुझाव दिया गया है। ये समितियां परिसर और छात्रावासों का औचक निरीक्षण करने के साथ नियमित जागरूकता अभियान संचालित करेंगी।

शैक्षणिक संस्थानों को स्थानीय पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और मान्यता प्राप्त नशामुक्ति केंद्रों से सीधे जोड़ने की बात भी कही गई है, ताकि जरूरत पड़ने पर प्रभावित विद्यार्थी को समय पर विशेषज्ञ सहायता उपलब्ध कराई जा सके।

प्रो. देवेंद्र भसीन ने उम्मीद जताई कि विश्वविद्यालयों के कुलपति इस गंभीर विषय को प्राथमिकता देते हुए प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करेंगे। उन्होंने कहा कि युवा वर्ग समाज की प्रमुख शक्ति है और उसे नशे से दूर रखने के लिए शिक्षण संस्थानों, सरकार और समाज को मिलकर प्रयास करने होंगे।

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